Wednesday, 21 December 2016

कभी मौसम नहीं बदला हमारा
रहे कुहरे के हम , कुहरा हमारा

उन्हें रहना था ग़ालिब ,हमको गाफ़िल
यूं ही कि चलता रहा रिश्ता हमारा

ज़माने भर के कमरे में है खिड़की
पर इक खिड़की में है कमरा हमारा

तुम्हारे लम्स ही बिखरे पड़े थे
वो था कहने बस कमरा हमारा

कहानी पर थे हम ग़ालिब वगरना
ज़ुरूरी था नहीं मरना हमारा

मुसलसल याद से इक बच रहे थे
इसी में कट गया रस्ता हमारा

हम अपने दिल की दुनिया में हैं लेकिन
यहां भी जी नहीं लगता हमारा

पूजा भाटिया

Thursday, 3 November 2016

इन पहाड़ों ने मुझे लौटा दी मेरी ही सदा
 मैं ने हैरां हो के,मंज़र ख़ूबसूरत कर दिया 
ان پہا ڈاں نے مجھے لوٹا دی میری ہی صدا 
مینے حیراں ہو کے منظر خوبصورت کر دیا 

मौजिज़े की रात थी वो, साथ था सूरज मेरे 
और मेरे चार जानिब सर्द थी बादे सबा 
معجزے کی رات تھی وو ،ساتھ تھا سورج میرے 
اور میرے چار جانب سرد تھ بادی صبا 

उंगलियों में थी बसी ख़ुशबू वही मासूम सी 
चूम कर हाथों को मेरे शाख़ पर इक गुल खिला
 انگلیوں می تھی بسی خوشبو وہی ماسوم سی 
چوم کر ہاتھوں کو میرے شاخ پر اک گل کھلا 

देर से वो शख़्स हैरानी से तकता है मुझे 
देख कर सिगरट मेरे हाथों में उसको क्या हुआ? 
در سے وو شخص حیرانی سے تکتا ہے مجھے 
دیکھ کر سگرٹ میرے ہاتھوں میں اسکو کیا ہوا 

मैं ख़फ़ा हूँ ये बताने में ज़रा देरी हुई 
जी इसी वक़्फ़े में मुझ से हो गया वो भी ख़फ़ा
 میں خفا ہوں یہ بتانے میں ذرا دری ہوئی 
جی اسی وقفے میں مجھسے ہو گیا وو بھی خفا 

मौसमों के इश्क़ में था दश्त,कल की बात है 
उन दिनों ख़ुश- ख़ुश रहा करता था यूं वीरां न था 
موسموں کے عشق میں تھا دشت، کل کی بات ہے 
ان دنوں خوش۔ خوش رہا کرتا تھا یوں ویراں ن تھا 

उसने ये पूछा कि क्या घर पर सभी मौजूद हैं? 
मैंने झट से हाँ कहा फट से रिसीवर रख दिया
 اسنے یہ پوچھا کی کیا گھر پر سبھی موجود ہیں
 مینے جھٹ سے ہاں کہا پھٹ سے ریسیور رکھ دیا 
Pooja

Tuesday, 11 October 2016

सर्द रिश्तों की बर्फ़ पिघली है.....

सर्द रिश्तों की बर्फ़ पिघली है
धूप मुद्दत के बाद निकली है
سرد رشتوں کی برف   پگھلی  ہے
دھوپ مدّت  کے بعد نکلی ہے
नींद आँखों से ये चुरायेगी
गश्त पर याद फिर से निकली
نیند آنکھوں سے یہ چرےیگی
گشت پر یاد پھرسے  نکلی ہے
हर नयी लहर में नया पानी
वो जो पिछली थी,अब वो अगली है
ہر نیی لہر میں نیا پانی
وو جو پچھلی تھی ،اب وو اگلی ہے
रंग वो ही भरेगी दोनों में
अपनी यादों की वो जो तितली है
رنگ وو ہی بھرگی دونوں میں
اپنی یادوں کی وو جو تتلی ہے
फूट पानी में पड़ गयी है क्या
लहर दरिया बनाने निकली है
پھوٹ پانی میں پڑ گیی ہے کیا
لہر دریا بنانے نکلی ہے
मेरे जीने को बस ये है काफ़ी
तू है,बारिश है,और तितली है
میرے جینے کو بس یہ کافی ہے
تو ہے ، بارش  ہے   اور تتلی ہے
बेख़याली में गिर पड़ी होगी
वो नहीं जानती वो बिजली है
بے خیالی  میں گر پڑی ہوگی
وو نہیں جانتی وو بجلی ہے
चाँद को चुग गया था इक पंछी
चांदनी फिर कहाँ से निकली है
چاند کو چوگ گیا تھا اک پنچھی
چاندنی پھیر کہاں سے نکلی ہے
वज्ह तुम ही थे मेरे जीने की
वज्ह अब भी कहाँ ये बदली है
وجہ تم ہی تھے میرے جینے کی
وجہ اب بھی کہاں یہ بدلی ہے
उडती है ग़म लिए परों पर जो
कैसी खुशरंग सी वो तितली है
اڑتی ہے غم لئے پروں پر جو
کیسی خوش رنگ سی وو تتلی ہے
तुझ से तस्वीर तेरी अच्छी है
बाद मुद्दत भी वो न बदली है
تجھسے تصویر تیری اچّھی ہے
بعد  مدّت بھی وو ن  بدلی ہے

Pooja Bhatia

Tuesday, 4 October 2016

Gazal...

नींद नहीं थी आँखों में,ख़ाब मगर अक्सर आये
इस घर की उम्मीद में वो, छोड़ के अपना घर आये
 نیند  نہیں تھی آنکھوں میں خاب مگر اکسر آے
اس گھر کی امید میں وو چھو ڈ  کے اپنہ گھر آے

सूखे पत्ते हैरां थे, बिन मौसम की बारिश से
तेरी मेरी बातों से, क्या अच्छे मंज़र आये
سوکھے  پتے حیراں تھے بن موسم کی بارش سے
تیری میری باتوں سے ، کیا اچھے  منظر آے

वीरानी में जंगल की, पत्तों की आवाज़ें थीं
जंगल बच्चा था ..सो हम, दिल रखने को डर
ویرانی میں جنگل  کی ، پتوں کی آوازیں  تھیں
جنگل بچھا  تھا سو ہم ،فل رکھنے کو در آے

सब कुछ सूखा -सूखा था ,सूखी शाखें, सूखे पेड़
तेरी बातें कर कर के,जंगल धानी कर आये
سب کچھ سوکھا  سوکھا تھا ، سوکھی شاکہیں  سوکھے پیڈ
تیری باتیں کر کر کے، جنگل دھانی کر آے

मायूसी का मौसम था, मायूसी  ही ग़ायब थी
एक गुज़ारिश मौसम से,आये तो खुल कर आये
مایوسی  کا موسم تھا مایوسی ہی غایب تھی
ایک گزارش موسم سے ، آے تو کھل کر آے

अश्कों का वो मेला था ,अश्क बिके बाज़ारों में
तुमको अश्क नहीं लेने? फिर बाहर क्यूँ कर आये?
اشکوں کا وو ملا تھا ، اشک بکے بازاروں میں
تمکو اشک نہیں لینے ؟ پھر باہر کیوں کر آے

कैसी अच्छी तारीकी ,क्या ही खूब अँधेरा था
सब अपना अपना सा था ,हम वापस जब घर आये
کیسی اچھی تاریکی کیا ہی خوب ا اندھیرا تھا
سب  اپنا اپنا سا تھا ، ہم واپس جب گھر آے

एक इशारा,एक झलक,पहला बोसा ,पहला लम्स
वैसे के वैसे ही थे,जब भी हम छत पर आये
ایک اشارہ ،ایک جھلک ،پہلا بوسہ ،پہلا لمس
ویسے کے ویسے ہی تھے ،جب بھی ہم چھت پر آے
Pooja Bhatia

Wednesday, 28 September 2016

एक ग़ज़ल.....


इस तरह से अपना सौदा कर दिया
मुझ में हिस्सा तेरा दुगना कर दिया

कुछ नहीं था देखना तेरे सिवा
मैंने हर चेहरे को तुझसा कर दिया

वक़्त का दिल आ गया मुझ पर तभी
मैंने सबका काम पक्का कर दिया

दूर तक पानी का सहरा था मगर
प्यास ने पानी को रुस्वा कर दिया

मर रहा था प्यास से सहरा तभी
रो के इन आँखों ने दरिया कर दिया

फेर ली उसने नज़र जाते हुए
काम उसने मेरा आधा कर दिया

ये उदासी हर तरफ़ बिखरे न सो
नाम इसके एक कमरा कर दिया

उस ने सब रक्खा था सब के वास्ते
हम ने सब कुछ तेरा-मेरा कर दिया
पूजा