Saturday, 27 May 2017

वाक़या हाल ही का है, एक मुशायरे में जाना हुआ। कमोबेश हर शायर ने अपने कुछ कलाम तहत में पढ़े और फिर अचानक बिना कोई चेतावनी दिए गले के की-बोर्ड को खंखार कर झटका,पटका, कुछ  ठिकाने लगाया और तरन्नुम के दरिया में छलांग लगा दी। उनमें से कुछ तो हमें अपने साथ डुबो देने को आमादा थे, कुछ हद तक उनकी कोशिशें कामयाब होती दिख भी रही थी कि अल्लाह के रहमो करम्  से ख़ुद उनके गले ने आगे बढ़ने से जवाब दे दिया और हम शहीद  होते होते बाच गए ,पर फिर भी अपने कानों को ज़ख़्मी होने से बचा न पाए।  ख़ैर... तहत या तरन्नुम शायर की अपनी पसंद  का मुआमला है जिस पर मुझे कोई ऐतराज़ नहीं। पर ये तो सीधा सीधा बदला लेना है कि आप अपनी एक ही ग़ज़ल को तरन्नुम के अखाड़े में 20 मिनट तक पेलते रहें और वो भी इस उम्मीद से की बतर्ज़े 2 एकम 2, 2 दूनी 4  लोगों को अपनी ग़ज़ल रटवा के ही मानेंगे।
मुझे तो ये ख़ालिस अत्याचार लगा...इतना कि कानों को बचाने के चक्कर में  फ़सील की मानिंद जो रुई ठूंसी थी वो पहले मिसरे के  repeat  होते ही  कान का साथ छोड़ कर वातानुकूलित हवाओं का हाथ थाम अपनी जान को बचा गयी और हमारे कान और ज़हन दोनों ज़ख़्मी हो गए।
पर जैसा कि हम जानते हैं हर चीज़ का अंत तय है...उस अत्याचार का भी हुआ। जब मेरी बारी आई तो बमुश्किल अपना बेलेंस बनाते हुए मैंने अपना कलाम पढ़ना शुरुअ किया, अभी दो-एक शेर पढ़े ही थे कि कहीं से आवाज़ आयी "मोहतरमा आप से तो तरन्नुम में ही सुनेंगे "...
ख़ुदा कसम एक बारगी दिल किया कि बदला लेने का ऐसा मौका फिर जाने कब  मिले. सारे सुरों  की खिचड़ी बना के पेल  दी जाए। पर तुरंत ही ज़हन ने दिल पर लात मारी ओर बद्दुआएं जमअ न करने की ताक़ीद की। सो मैं तहत का दामन पकड़े रही।
इतने में फिर एक आवाज़ नाचती कूदती मुझ तक आयी कि कुछ गाकर सुनाइये....मैने कहा मैं ज़ुरूर गाती पर मैं कानून की बेहद इज़्ज़त करती हूँ, मेरे और तरन्नुम के दरमियाँ इ एक करार नामा है जो मुझे रोकता है...मुझे मुआफ़ कीजियेगा।...
पूछने पर  की कैसा ओर कौन सा करार...?  मुझे बताना पड़ा।
दोस्तो कुछ अरसे पहले की बात है लता ताई...( अरे हमारी अपनी लता मंगेशकर  ) और मेरे बीच एक कानूनी करार हुआ है जिसके तहत हम दोनों ने एक-एक अहद उठायी है  और वो ये कि वो कभी भी ग़ज़ल नहीं कहेंगी ...और मैं गाऊँगी नहीं.
इस तरह हम दोनों एक दूसरे के पेट पे लात न मारेंगे।
और  इस  करारनामे की बदौलत में ही जानती हूँ कि मैंने कितनी दुआएं इकठ्ठा की।
मुशायरे के बअद कुछ लोगों ने चुपके से मेरे ज़ख़्मी कान में कहा..
काश की ऐसा  करारनामा बाक़ी के शायर भी बनवा लें......
मैं मुस्कुरा दी.....और मैं कर भी क्या सकती थी।
पूजा

Monday, 15 May 2017

 "बददुआ और शायर "

Topic थोड़ा unusual  है पर आपकी तवज्जो चाहता है। बात बद्दुआ से शुरू करते हैं।  बददुआ लेना कोई बड़ी बात नहीं  बस कुछ सोचे- समझे बदकर्म  करने होते हैं और इस हुनर में तो कमोबेश हर उस इंसां को जो ख़ुदा से बस एक दर्जा नीचे  रह गया है महारत हासिल है। सो बद्दुआ कमाना  कोई बड़ी बात नहीं।
पर बद्दुआ देना????  
न न न न नन......इसे आसान समझने की ग़लती कतई न कीजियेगा। ये हुनर अच्छे अच्छों को नहीं आता।
एक तगड़ी और असरदार बद्दुआ देना आने के लिए कुछ characteristics निहायत ज़ुरूरी है।
फिर चचा ग़ालिब कह भी गए हैं..."आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक"....
तो ये जो "इक उम्र" है ये सारे characteristics learn करने के लिए चाहिए होती है तब कहीं जाकर आह का असर होता है।....हाँ तो हम लाज़मी characteristics की बात कर रहे थे। तो वो हैं.......

1....मौकापरस्ती---आप मौके की ताक़ में रहें, यानी ये मौका मिला, ओर ये बद्दुआ रवाना।

2....उन लफ़्ज़ों को चुन चुन कर याद करना जो कि लुगत में न हो, ओर मौका मिलते ही फ़ौरन उनका इस्तेमाल बेहद गलीज़ तरीक़े से करने का हौसला रखना।

3....चेहरे का ख़ाका बदलने का माद्दा...यूँ तो परवरदिगार ने सभी को दो आंखें, नाक , कान वगैरह वगैरह एक  से दिए हैं। जिनको इंच ब इंच एक तयशुदा खांचे में रख कर एक ख़ास चेहरा तैयार होता है, जिस से हम पहचाने जाते हैं।पर बद्दुआ देने वाले में ये ख़ासियत निहायत ज़ुरूरी है कि वो बद्दुआ देते वक़्त अपने चेहरे पर चस्पा अंगों को तयशुदा इंच ब इंच एंगल से उखाड़ कर कुछ यूं बदल दे कि चेहरा तक़रीबन क्रूर और कुछ ज़्यादा असली लगने लगे। मसलन  त्यौरियां 90 के एंगल तक खींचना, नाक 45 के एंगल तक फुलाना, होठों की रेडियस बुरी तरह से बिगाड़ना, आँखों  का एरिया बढ़ाना वगैरह....
 इस से 2 बातें होंगी
पहली ये की बद्दुआ देने में असर मालूम होगा, जैसे दवाई गर कड़वी हो तो बीमार के जल्दी ठीक होने का डर होता है,  बिल्कुल वैसे ही।
दूसरी ये की ख़ुदा न करे अगर कोई ऐन बद्दुआ देते वक़्त  मौके पर मौजूद न हो और ठीक बदुआ देने के बाद जलवाफ़रोश हो  तो वो बद्दुआगो का चेहरा मोहरा देख कर ही समझ जाये कि ....
अव्वल तो बद्दुआ दी गयी है, और 
दोयम ..किस दर्ज़े की दी गयी है।

4.चौथी और सबसे ज़ुरूरी  सिफ़त है हस्सास  होना... भई बग़ैर हस्सास हुए कैसे अंदाज़ा होगा कि किस असर की बद्दुआ रवाना करनी है। सो बदकर्म का अंदाज़ा लगा कर ही बद्दुआ की डोज़ तय की जाए।
यूँ नहीं कि ज़रा चलते चलते किसी से टकरा गये ओर श्राप दे मारा..की beep beep... अल्लाह  करे
तुम ताउम्र एक ही जगह खड़े चलते रहो और कहीं न पहुंचो beep beep.... गोया ज़रा सी लात क्या लग गयी किसी  मासूम को ताज़िन्दगी  के लिए ट्रेडमिल पे खड़ा कर दिया और बद्दुआ का बटन ऑन...
न न न न...ये तो ठीक नहीं न...हड्डी टूटना, कीड़े पड़ना, या सिर्फ मुंह बिसुरा के खा जाने वाली नज़रों से देख लेना ये बेसिक ओर कॉमन बद्दुआऐं हैं जो ऐसे बदकर्म के लिए काफ़ी हैं।
सो हस्सास होना  बेहद ज़ुरूरी है बद्दुआ की कैटेगरी तय करने के लिए।

 तो अब मसअला ये की कोई शायर बद्दुआ कैसे देगा??
शायर चाहे कितना ही सर पटक ले  तो भी ये बेहतरीन बद्दुआगो होने  के लिए ज़रूरी तमाम तौफ़ीक़ हासिल कर ही नहीं सकता। और तिस पर उसे सिवा  मुहब्बत के कुछ आता भी नहीं।

मसलन मौका मिलने पर शायर तुरंत उस मौके का इस्तेमाल न करते हुए उस मौके की घंटो की जुगाली करता है, और अगर उसके बाद कुछ बन  भी पड़ा तो तब तक बदकर्म करने वाला बैडमैन तो कहां का कहां निकल चुका होता है। नतीजा. ....   फ़ेल
अब अगर चेहरे का नक़्शा बिगाड़ने की बात करें तो शायर शायरी के चलते बह्र का इस क़दर पाबंद हो जाता है कि चेहरे के हाव भाव भी निहायत बह्र में रहते हुए इंच ब इंच वहीं रहते हैं,  मजाल है कि ज़रा इधर से उधर हो जाऐं।
  तो सिवा हस्सास होने के शायर तो  बेहतरीन बद्दुआगो होने की कोई शर्त  पूरी नहीं करता।
तो क्या  शायर बद्दुआगो नहीं हो सकता?? 
अजी नहीं.....मियाँ शायर एक बाकमाल तरक़ीब का इस्तेमाल करता है जिस से सांप तो मरता ही है और लाठी..अजी लाठी टूटना छोड़िए दिखती भी नहीं। लोग हैरान की मियाँ मारा तो मारा किस से??
तो शायर करता ये है कि बद्दुआ के तमाम अहसास बेइन्तेहाँ चाशनी में घोल कर  बशर-ए-ख़ुसूस पर शेर की सूरत में छोड़ देता है। और वो शख़्स लफ़्ज़ों की हाई डोज़ शुगर के चलते मेन्टल डाइबिटीज़ के सुपुर्द हो जाता है।
एक शायर  किसी दूसरे शायर को जो बद्दुआएं दे सकता है उसके दो नमूने "मुश्ताक़ अहमद युसूफ़ी" साहब के जिगरी दोस्त "मिर्ज़ा उदूद बेग़" के हवाले से  पढ़ने वालों पर खुले छोड़े जा रहे हैं...
अल्लाह करे तुम्हारा सारा कलाम दैवीय कलाम हो...(सनद रहे कि दैवीय कलाम वो कलाम है  जिसमें दो मिसरों में इतने झोल और ग़लतियाँ  हों कि वो इंसानी नहीं दैवीय मदद मालूम हो।)

अल्लाह करे कि तुम्हारी कब्र में कीड़े और शेर में सकते पडें......
पूजा

Friday, 12 May 2017

 अमृता प्रीतम....मेरी नज़र में


"जिस्म की भूख के हाथों पीड़ित हो कर एक बार मैनें बाज़ार की किसी औरत के पास जाना चाहा था".....इमरोज़ ने कहा।
सहज मेरे मुंह से निकला...,."अगर तुम ऐसी किसी औरत के पास जाते तो मेरा जी करता है कि वो औरत भी मैं ही होती"...अमृता ने कहा।
ये अमृता थीं, इस बात को और अपनी ज़िंदगी से जुड़ी तमाम बातों को मानने ओर जगज़ाहिर करने की हिम्मत रखने वालीं...अमृता
कौन थी अमृता???
लेखकों की तवील फ़ेहरिस्त में खड़ी एक लेखिका??? या एक आम औरत??
नहीं...अमृता महज़ एक लेखिका या औरत नहीं थी..वो एक सच्चाई थी जिसकी ज़िन्दगी सच्चे लम्हों और सच्चे लोगों से हैरानगी की हद तक भरी थी।
क्या थी अमृता ....जब आंखें मूंद कर ये सोचती हूं। तो तेज़ रौशनी का एक पुँज जो साफ़गोई, साफ़ दिली , ओर बेइंतहां सादगी से भरा है, सामने पाती हूँ ।ये अमृता है।
अमृता के क़िरदार और उनके कलाम पे नुक्ताचीनी करने वाले लोग शायद वे लोग है जो 'अंधेरे में सब जायज़ है' के फ़लसफ़े को मानते हैं,और सच के उजाले में जिनकी कायर आंखें मिचमिचा जाती हैं।

अमृता का नाम ज़हन में आते ही साहिर ओर इमरोज़ ये दो नाम बेसाख़्ता साथ चले आते हैं।ये तीनो क़िरदार ज़िन्दगी के तिराहे पे कुछ यूं खड़े हैं जहां से अमृता ,इमरोज़ और साहिर दोनों को देख सकती है। जहाँ इमरोज़ का मरकज़ सिर्फ़ अमृता है,वहीं अमृता की नजरें साहिर पे टिकी हैं । साहिर एक पल को अमृता से नज़रें मिलाता है  और फिर अपने दिल को दुनिया की तरफ़ मोड़ देता है। अमृता ठगी सी रह जाती है और उसकी नज़र इमरोज़ की ओर उठती है और फिर वहीं  ठहर जाती है।

साहिर ...अमृता का पहला प्यार....जिसके साथ उसने प्यार के म्'आनी समझे ।पर इमरोज़ के साथ उस म्'आनी को जिया।दरअस्ल अमृता ने इमरोज़ में छिपे साहिर को चाहा। ओर इस तरह वो तमाम उम्र साहिर ही को चाहती रही।
अमृता की ज़िंदगी में साहिर एक आंधी की तरह आया। वो मीठी उम्र थी। उस उम्र में इश्क़ मुहब्बत की ख़याली दुनिया को हक़ीक़त का जामा पहनाने की  कितनी बैचेनी होती है, इस ख़याल से कौन नावाकिफ़ होगा? बिना किसी छल के, सारी सच्चाईयों को उधेड़े हुए ये वक़्ती आंधी एक सम मौसम बन कर अमृता के चारों और बसने लगती है। और फिर अमृता साहिर के होते हुए भी उसके न होने में उसे जीती है।
कभी साहिर के छोड़े हुए सिगरेट के टुकड़ों  से उसके होठों की छुअन पाते हुए, यो कभी सर्दी में साहिर
की छाती पर बाम लगा चुकने के बाद उसके लम्स से गर्मी पाते हुए।
कोई मजबूरी... कोई बेवफ़ाई... कोई सच्चाई....या फिर क़िस्मत का लेखा..... उनका ऐका न हुआ।
दो चमकते सितारे मिल कर सूरज न बन सके...सो...अलग-अलग चमके।एक दूसरे को देखते हुए।
एक दूसरे का ताप पाते हुए......
फिर एक रोज़ काम के सिलसिले में इमरोज़ का अमृता से मिलना...एक आम सी मुलाक़ात।सादा लौह 
इमरोज़ उस मिट्टी की तरह  मिला, जिसने जड़ से उखड़ी हुई अमृता को आधार दिया। 
जिस्म को रूह मिली। एक तेज़ चमकते सितारे में एक कम चमकीला सितारा पूरी तरह विलीन हो गया।
अमृता को ठहराव, भरोसा, निश्छल प्रेम सब कुछ देता हुआ...और बदले में कुछ न चाहता हुआ।
इमरोज़ ताउम्र अमृता का रहा...और आख़िर में अमृता ही हो गया।
कितनी अजीब बात है, अमृता ने साहिर को चाहा , फिर उसे पाना भी चाहा पर  कभी पा न सकी। वहीं इमरोज़ ने अमृता को चाहा, पर उस से कभी कुछ न चाहा और उसे पा गया.....
अमृता की ज़िंदगी जाने कितने वक़्ती थपेड़ों और ऊंच नीच से भरी थी। कभी समाज का तो कभी अपने आप का सामना करते हुए वो जीवन रण में डटी रही।
जाने कैसा दरख़्त थी जो मौसम की हर मार को पछाड़ कर हमेशा हरी रही।अपने आस पास से आहत अमृता ने अपने अंदर की सच्चाई को मरने या बिखरने नहीं दिया।
शायद यही वजह थी की अमृता की ज़िंदगी सच्चे लोगों, सच्चे लम्हों, और बेहिसाब हैरानियों से भरी थी। जिसे उसने न सिर्फ जिया बल्कि क़ुबूल भी किया।
यही सब सोचते हुए मेरी नींद लग जाती है, तो ख़ाब में अमृता को पाती हूँ। उसी चिरपरिचित मुस्कान के साथ...आंखों में बच्चों की सी चमक लिए...अपने को रोक नहीं पाती और पूछ बैठती हूँ....
अमृता आपको डर नहीं लगा??? कि लोग क्या कहेंगे???
और अमृता ने   बेहद  संजीदगी से हौले से मुस्कुराते हुए जवाब दिया...
कौन लोग पूजा???वही जो कभी सामने आने की हिम्मत नहीं करते????
मैं उठ जाती हूँ और बरबस मेरे मुंह से निकलता है....ये है अमृता......
पूजा