Tuesday, 11 October 2016

सर्द रिश्तों की बर्फ़ पिघली है.....

सर्द रिश्तों की बर्फ़ पिघली है
धूप मुद्दत के बाद निकली है
سرد رشتوں کی برف   پگھلی  ہے
دھوپ مدّت  کے بعد نکلی ہے
नींद आँखों से ये चुरायेगी
गश्त पर याद फिर से निकली
نیند آنکھوں سے یہ چرےیگی
گشت پر یاد پھرسے  نکلی ہے
हर नयी लहर में नया पानी
वो जो पिछली थी,अब वो अगली है
ہر نیی لہر میں نیا پانی
وو جو پچھلی تھی ،اب وو اگلی ہے
रंग वो ही भरेगी दोनों में
अपनी यादों की वो जो तितली है
رنگ وو ہی بھرگی دونوں میں
اپنی یادوں کی وو جو تتلی ہے
फूट पानी में पड़ गयी है क्या
लहर दरिया बनाने निकली है
پھوٹ پانی میں پڑ گیی ہے کیا
لہر دریا بنانے نکلی ہے
मेरे जीने को बस ये है काफ़ी
तू है,बारिश है,और तितली है
میرے جینے کو بس یہ کافی ہے
تو ہے ، بارش  ہے   اور تتلی ہے
बेख़याली में गिर पड़ी होगी
वो नहीं जानती वो बिजली है
بے خیالی  میں گر پڑی ہوگی
وو نہیں جانتی وو بجلی ہے
चाँद को चुग गया था इक पंछी
चांदनी फिर कहाँ से निकली है
چاند کو چوگ گیا تھا اک پنچھی
چاندنی پھیر کہاں سے نکلی ہے
वज्ह तुम ही थे मेरे जीने की
वज्ह अब भी कहाँ ये बदली है
وجہ تم ہی تھے میرے جینے کی
وجہ اب بھی کہاں یہ بدلی ہے
उडती है ग़म लिए परों पर जो
कैसी खुशरंग सी वो तितली है
اڑتی ہے غم لئے پروں پر جو
کیسی خوش رنگ سی وو تتلی ہے
तुझ से तस्वीर तेरी अच्छी है
बाद मुद्दत भी वो न बदली है
تجھسے تصویر تیری اچّھی ہے
بعد  مدّت بھی وو ن  بدلی ہے

Pooja Bhatia

Tuesday, 4 October 2016

Gazal...

नींद नहीं थी आँखों में,ख़ाब मगर अक्सर आये
इस घर की उम्मीद में वो, छोड़ के अपना घर आये
 نیند  نہیں تھی آنکھوں میں خاب مگر اکسر آے
اس گھر کی امید میں وو چھو ڈ  کے اپنہ گھر آے

सूखे पत्ते हैरां थे, बिन मौसम की बारिश से
तेरी मेरी बातों से, क्या अच्छे मंज़र आये
سوکھے  پتے حیراں تھے بن موسم کی بارش سے
تیری میری باتوں سے ، کیا اچھے  منظر آے

वीरानी में जंगल की, पत्तों की आवाज़ें थीं
जंगल बच्चा था ..सो हम, दिल रखने को डर
ویرانی میں جنگل  کی ، پتوں کی آوازیں  تھیں
جنگل بچھا  تھا سو ہم ،فل رکھنے کو در آے

सब कुछ सूखा -सूखा था ,सूखी शाखें, सूखे पेड़
तेरी बातें कर कर के,जंगल धानी कर आये
سب کچھ سوکھا  سوکھا تھا ، سوکھی شاکہیں  سوکھے پیڈ
تیری باتیں کر کر کے، جنگل دھانی کر آے

मायूसी का मौसम था, मायूसी  ही ग़ायब थी
एक गुज़ारिश मौसम से,आये तो खुल कर आये
مایوسی  کا موسم تھا مایوسی ہی غایب تھی
ایک گزارش موسم سے ، آے تو کھل کر آے

अश्कों का वो मेला था ,अश्क बिके बाज़ारों में
तुमको अश्क नहीं लेने? फिर बाहर क्यूँ कर आये?
اشکوں کا وو ملا تھا ، اشک بکے بازاروں میں
تمکو اشک نہیں لینے ؟ پھر باہر کیوں کر آے

कैसी अच्छी तारीकी ,क्या ही खूब अँधेरा था
सब अपना अपना सा था ,हम वापस जब घर आये
کیسی اچھی تاریکی کیا ہی خوب ا اندھیرا تھا
سب  اپنا اپنا سا تھا ، ہم واپس جب گھر آے

एक इशारा,एक झलक,पहला बोसा ,पहला लम्स
वैसे के वैसे ही थे,जब भी हम छत पर आये
ایک اشارہ ،ایک جھلک ،پہلا بوسہ ،پہلا لمس
ویسے کے ویسے ہی تھے ،جب بھی ہم چھت پر آے
Pooja Bhatia