Monday, 24 July 2017

ग़ज़ल...दश्त की थी धूप मैं

दश्त की थी धूप मैं, था शाख़ पर मकाँ मिरा
चुभ रहा था तीरगी को कब से आशियाँ मेरा
किस तरह से पायेगा निजात ग़म से दिल मुआ
जब मुझे यक़ीन ये, मकीं मिरा मकां मिरा
मेरी तिश्नगी को पी न जायें ये सराब और
मंज़िलों की चाह में सफ़र हो रायगाँ मिरा
बाँटने चला था जो मुझी से मुझको देखिये
बंट के रह गया वही, बचा रहा जहां मिरा
पूजा भाटिया 

Sunday, 23 July 2017

Ghazal..सफ़र तो था

सफ़र तो था मगर रस्ता नहीं था 
मुसाफ़त के सिवा चारा नहीं था

तमाशाबीं तवज्जो चाहता था  
तमाशे पर तभी चौन्का नहीं था

मकां था दिल मेरा,ऐसा मकां पर
सब आते थे ,,,,कोई रुकता नहीं था

दुआओं में था वो शामिल... मगर हाँ
उसे मैनें कभी मांगा नहीं था

Pooja