Thursday, 5 January 2017

Gazal....


देखी गली न उसकी, कभी उसका दर न देखा
सब कुछ अबस है, उसको तूने अगर न देखा
دیکھی گلی ن اسکی  کبھی اسکا در ن دیکھا 
سب کچھ عبد  ہے اسکو، تونے اگر ن دیکھا 
वो साथ था तो मेरे क़दमों में मंज़िलें थी
पर उसके बाद मैं ने, वैसा सफ़र न देखा
وو ساتھ تھا تو میرے  قدموں میں منزلیں تھیں 
پر اسکے بعد میںنے ، ویسا سفر ن دیکھا 
मेमार के ही हाथों, टूटा था जो वो घर हूँ
अपनों के हाथ अपना, ज़ेरो-ज़बर न देखा
ممار  کے ہی ہاتھوں ، ٹوٹا تھا جو وو گھر ہوں 
اپنوں کے ہاتھ اپنا زیرو -زبر ن دیکھا 
जिसको तमाम दुनिया में ढूंढती रही मैं
मुझमें ही रह रहा था, मैं ने मगर न देखा
جسکوتمام دنیا میں دھندھتی  رہی میں 
مجھمیں ہی رہ رہا تھا، میں نے مگر ن دیکھا 
कहने को उम्र कम है, हर सम्त है नज़ारे
इक उम्र में ही मैनें, क्या-क्या मगर न देखा
کہنے کو امر کم ہے ، ہر سمت ہے نظارے 
اک امر میں ہی میں نے کیا کیا مگر ن دیکھا 
थी ख़ाक उसकी क़िस्मत, सो आया ख़ाक ले कर
था सामने गुहर पर, उसने उधर न देखा
تھی خاک اسکی قسمت ، سو آیا خاک لیکر 
تھا سامنے  گھر پر ، اسنے ادھر ن دیکھا 
नाराज़गी की शायद, थी इन्तिहाँ तभी तो
उसने इधर न देखा, मैंने उधर न देखा
ناراضگی کی شاید ، تھی انتہاں  تبھی تو 
اسنے ادھر ن دیکھا ، میں نے ادھر ن دیکھا 
Pooja

Wednesday, 4 January 2017

सारी शब ढूंढता फिरा है मुझे
ख़ाब इक चाहने लगा है मुझे
अब तो कुछ भी हो डर नहीं लगता
“अपने अंजाम का पता है मुझे”
मैं उसे देखती रहूं इक टुक
यानी बस उस को देखना है मुझे
अब वो डरता है, खो न जाऊं मैं
उसने ख़ुशबू बहुत लिखा है मुझे
जिसने खोया हो आ के ले जाए
चाँद कल रात इक मिला है मुझे
लुत्फ़ जो है समेटने में है
सो वो पागल बिखेरता है मुझे
एक लड़का था..एक लड़की थी
ये कहानी थी इक.. पता है मुझे
जब वो बहकी थी तब नदी सी थी
फिर हुआ क्या ये जानना है मुझे

ساری شب دھندھتا  پھرا ہے مجھے 
خواب اک چاہنے لگا ہے مجھے 

اب تو کچھ بھی ہو در نہیں لگتا 
اپنے انجام کا پتا ہے مجھے 

میں اسے دیکھتی رہوں اکٹوک  
یانی بس اسکو دیکھنا ہے مجھے 

اب وو ڈرتا ہے کھو ن جان میں 
اسنے خوشبو بہت لکھا ہے مجھے 

جسنے کھویا ہو آکے لے جائے 
چاند  کل رات اک ملا ہے مجھے 

لطف جو ہے سمیٹنے  میں ہے 
سو وو پاگل بکھیرتا  ہے مجھے 

ایک لڑکا تھا ..... ایک لڑکی تھی 
یہ کہانی تھی اک .... پتا ہے مجھے 

جب وو بہکی تھی ،تب ندی سی تھی 
پھر ہوا کیا ... یہ جاننا ہے مجھے 
Pooja 

Monday, 2 January 2017

ग़ज़ल...


सुना है मैंने वो पछता रहा है
यकीं लेकिन किसे अब आ रहा है

ये दुनिया चार दिन का खेल माना
समझ ये खेल किसको आ रहा है

मेरे चेहरे पे क्या लिक्खा है ऐसा
जिसे देखो मुझे समझा रहा है

मैं उसकी हो रहूंगी तय है इक दिन
पता है,फिर भी दिल घबरा रहा है

ग़मों का उसके अंदाज़ा है तुमको?
वो दरिया हो के भी प्यासा रहा है

यकीं कैसे करूँ मैं वक़्त पर भी
ये खुद पल पल बदलता जा रहा है

उठा कर मुंह यूँही चलने को हो तुम
न जी पाये न मरना आ रहा ह

इस तरह से अपना सौदा कर दिया
मुझ में हिस्सा तेरा दुगना कर दिया

कुछ नहीं था देखना तेरे सिवा
मैंने हर चेहरे को तुझसा कर दिया

वक़्त का दिल आ गया मुझ पर तभी
मैंने सबका काम पक्का कर दिया

दूर तक पानी का सहरा था मगर
प्यास ने पानी को रुस्वा कर दिया

मर रहा था प्यास से सहरा तभी
“रो के इन आँखों ने दरिया कर दिया

फेर ली उसने नज़र जाते हुए
काम उसने मेरा आधा कर दिया

ये उदासी हर तरफ़ बिखरे न सो
नाम इसके एक कमरा कर दिया

उस ने सब रक्खा था सब के वास्ते
हम ने सब कुछ तेरा-मेरा कर दिया
पूजा