Tuesday, 11 December 2018

Tazaa ghazal

किसी ख़्वाहिश पे वारा जा रहा है
वो इक गुमनाम तारा जा रहा है

कोई लाया है ये पैग़ामे सहरा 
चलोतुमको पुकारा जा रहा है

उसे भाती है आंखों में नमी ,सो
उसे इकटक निहारा जा रहा है

यक़ीनन ये हवा है इश्क़ वाली
वो देखो, इक इशारा जा रहा है

गले सब मिल रहे हैं उस से हँस कर

हमारा हक़ तो मारा जा रहा है

Tuesday, 26 June 2018

Tazaa ghazal

एक नदी. के एक भंवर की
लो रक्खो चाबी लॉकर की 

शब के खाब सहर पर पूरे 
हमको एक तमन्ना घर की 

छू  कर पढ़ना सिलवट  सिलवट 
है ये ख्वाहिश इक चादर की 

ठीक है याद जुडी है पर तुम 
हालत तो देखो स्वेटर की 

जिस में ज़िक्र था इक ठोकर का 
एक कहानी थी पत्थर की 

भीतर से सब अनगढ़ पत्थर 
संगतराशी बस बाहर की  

हमें तो तामीर किया सब 
तुमने तो बस  ख़ाहिश भर की 

मैं रखती हूँ तुमको इसमें 

तुम रक्खो चाबी लॉकर की 

Pooja bhatia

Monday, 5 March 2018

ताज़ा ग़ज़ल

काम किया माज़ी पर हमने, ख़ाली वक़्त तमाम किया
हिज्र की रातें रो रो काटी, वस्ल की शब आराम किया
Kaam kiya maajhi pr humne, khaali waqt tamaam kiya
Hijr ki raatein ro ro kaati, wasl ki shab araam kiya

उम्र की लंबी पगडंडी पर, एक मुसाफिर तन्हा था
धूप की गठरी के साये में सफ़र किया , आराम किया
Umr ki lambi pagdandi pr eik musaafir tanhaa tha
Dhoop ki gathari ke saaye mein safar kiya aaraam kiya

सहरा की रग-रग से वाकिफ़ था वो एक शजर जिसको
आने वाली नस्ल ने अपनी वहशत का ईमाम किया
Sahraa ki rag-rag se waaqif thaa wo eik  shajar jisko
Aane waali nasl ne apni wahshat kaa imaam kiya

हम आहंग हुए सहरो-शब,दूर उफ़क़ पर रंग खिले
चाँद ने अपनी चांदी को फिर तारों में इनआम किया
Hum aahang hue sahr-o-shab dur ufaq pr rang khile
Chaand ne apni chaandi ko fir taaron mein in'aam kiya

कुछ फूलों को रंग तेरा और कुछ को तेरी ख़ुशबू दी
 यूँ  तेरी सारी यादों को बाग़ीचे के नाम किया
Kuch phulon ko rang tera or kuch ko teri khushbu di
Yuun teri sari yaadon ko naabhi he ke naam kiya

इक काग़ज़ पर शब लिक्खा फिर शब को काटा सुब्ह लिखा
बस ये ही इक काम किया और, काम ये सुबहो शाम किया
Ik kaaghaz pr shab likkhaa fir shab ko jaataa sub'h likhaa
Bas ye hi ik kaam kiyaa or kaam ye subh-o-shaam kiyaa

कैसे -कैसे लोग मिले हैं , इस दुनिया की बस्ती में
कुछ को काम में लाये हम और कुछ का हमनें काम किया
Kaese kaese log mile hein, is duniyaa ki basti mein
Kuch ko kaam mein laaye hum or kuch ka humne kaam kiya

Pooja Bhatia

Saturday, 17 February 2018

Dekhi gali n uski....ghazal

देखी गली न उसकी, कभी उसका दर न देखा
सब कुछ अबस है, उसको तूने अगर न देखा

वो साथ था तो मेरे क़दमों में मंज़िलें थी
पर उसके बाद मैं ने, वैसा सफ़र न देखा

मेमार के ही हाथों, टूटा था जो वो घर हूँ
अपनों के हाथ अपना, ज़ेरो-ज़बर न देखा

जिसको तमाम दुनिया में ढूंढती रही मैं
मुझमें ही रह रहा था, मैं ने मगर न देखा

कहने को उम्र कम है, हर सम्त है नज़ारे
इक उम्र में ही मैनें, क्या-क्या मगर न देखा

थी ख़ाक उसकी क़िस्मत, सो आया ख़ाक ले कर
था सामने गुहर पर, उसने उधर न देखा

नाराज़गी की शायद, थी इन्तिहाँ तभी तो
उसने इधर न देखा, मैंने उधर न देखा

Pooja Bhatia

Monday, 5 February 2018

Ghazal

दश्ते रंगे लहू भी देखेंगे
वहशते जुस्तजू भी देखेंगे
Dasht-e-rang-e-lahoo bhi dekhenge
Wahshat-e-justjoo bhi dekhenge
अब जो आये हैं आलमे कुन में
अब तेरा हूबहू भी देखेंगे
Ab jo aaye hein aalm-e-kun mein
Ab tera hu-b-hu bhi dekhenge
हम तेरे ख़ाब देखने वाले
अब तुझे रूबरू भी देखेंगे
Hum tere khwaab dekhne waale
Ab tujhe ru-b-ru bhi dekhenge
 हमनज़र भी हैं हमसफ़र ही नहीं
  ठैरिए चार सू भी देखेंगे
Hum nazar bhi hein humsafar hi nahin
Theiriye chaar su bhi dekhenge
रंग की मौत के गवाह थे हम
ख़ुशबुओं का लहू भी देखेंगे
Rang ki mout ke gawaah the hum
Khushbuon ka lahoo bhi dekhenge
Pooja Bhatia

Thursday, 1 February 2018

ग़ज़ल

याद कश्ती को तोड़ आये हम
दिल को दरिया जो कर न पाए हम

हो के बेघर ये इंकिशाफ़ हुआ
घर में कब थे बसे बसाये हम

 उसने औरों को फिर तवज्जो दी
उसको फिर से नज़र न आये हम

इश्क़ आये तो ढूंढ ले हमको
रह  न जाएं रखे रखाये हम

Pooja