दश्त की थी धूप मैं, था शाख़ पर मकाँ मिरा
चुभ रहा था तीरगी को कब से आशियाँ मेरा
चुभ रहा था तीरगी को कब से आशियाँ मेरा
किस तरह से पायेगा निजात ग़म से दिल मुआ
जब मुझे यक़ीन ये, मकीं मिरा मकां मिरा
जब मुझे यक़ीन ये, मकीं मिरा मकां मिरा
मेरी तिश्नगी को पी न जायें ये सराब और
मंज़िलों की चाह में सफ़र हो रायगाँ मिरा
मंज़िलों की चाह में सफ़र हो रायगाँ मिरा
बाँटने चला था जो मुझी से मुझको देखिये
बंट के रह गया वही, बचा रहा जहां मिरा
बंट के रह गया वही, बचा रहा जहां मिरा
पूजा भाटिया
No comments:
Post a Comment