Monday, 2 January 2017

ग़ज़ल...


सुना है मैंने वो पछता रहा है
यकीं लेकिन किसे अब आ रहा है

ये दुनिया चार दिन का खेल माना
समझ ये खेल किसको आ रहा है

मेरे चेहरे पे क्या लिक्खा है ऐसा
जिसे देखो मुझे समझा रहा है

मैं उसकी हो रहूंगी तय है इक दिन
पता है,फिर भी दिल घबरा रहा है

ग़मों का उसके अंदाज़ा है तुमको?
वो दरिया हो के भी प्यासा रहा है

यकीं कैसे करूँ मैं वक़्त पर भी
ये खुद पल पल बदलता जा रहा है

उठा कर मुंह यूँही चलने को हो तुम
न जी पाये न मरना आ रहा ह

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