Thursday, 5 January 2017

Gazal....


देखी गली न उसकी, कभी उसका दर न देखा
सब कुछ अबस है, उसको तूने अगर न देखा
دیکھی گلی ن اسکی  کبھی اسکا در ن دیکھا 
سب کچھ عبد  ہے اسکو، تونے اگر ن دیکھا 
वो साथ था तो मेरे क़दमों में मंज़िलें थी
पर उसके बाद मैं ने, वैसा सफ़र न देखा
وو ساتھ تھا تو میرے  قدموں میں منزلیں تھیں 
پر اسکے بعد میںنے ، ویسا سفر ن دیکھا 
मेमार के ही हाथों, टूटा था जो वो घर हूँ
अपनों के हाथ अपना, ज़ेरो-ज़बर न देखा
ممار  کے ہی ہاتھوں ، ٹوٹا تھا جو وو گھر ہوں 
اپنوں کے ہاتھ اپنا زیرو -زبر ن دیکھا 
जिसको तमाम दुनिया में ढूंढती रही मैं
मुझमें ही रह रहा था, मैं ने मगर न देखा
جسکوتمام دنیا میں دھندھتی  رہی میں 
مجھمیں ہی رہ رہا تھا، میں نے مگر ن دیکھا 
कहने को उम्र कम है, हर सम्त है नज़ारे
इक उम्र में ही मैनें, क्या-क्या मगर न देखा
کہنے کو امر کم ہے ، ہر سمت ہے نظارے 
اک امر میں ہی میں نے کیا کیا مگر ن دیکھا 
थी ख़ाक उसकी क़िस्मत, सो आया ख़ाक ले कर
था सामने गुहर पर, उसने उधर न देखा
تھی خاک اسکی قسمت ، سو آیا خاک لیکر 
تھا سامنے  گھر پر ، اسنے ادھر ن دیکھا 
नाराज़गी की शायद, थी इन्तिहाँ तभी तो
उसने इधर न देखा, मैंने उधर न देखा
ناراضگی کی شاید ، تھی انتہاں  تبھی تو 
اسنے ادھر ن دیکھا ، میں نے ادھر ن دیکھا 
Pooja

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