"बददुआ और शायर "
Topic थोड़ा unusual है पर आपकी तवज्जो चाहता है। बात बद्दुआ से शुरू करते हैं। बददुआ लेना कोई बड़ी बात नहीं बस कुछ सोचे- समझे बदकर्म करने होते हैं और इस हुनर में तो कमोबेश हर उस इंसां को जो ख़ुदा से बस एक दर्जा नीचे रह गया है महारत हासिल है। सो बद्दुआ कमाना कोई बड़ी बात नहीं।
पर बद्दुआ देना????
न न न न नन......इसे आसान समझने की ग़लती कतई न कीजियेगा। ये हुनर अच्छे अच्छों को नहीं आता।
एक तगड़ी और असरदार बद्दुआ देना आने के लिए कुछ characteristics निहायत ज़ुरूरी है।
फिर चचा ग़ालिब कह भी गए हैं..."आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक"....
तो ये जो "इक उम्र" है ये सारे characteristics learn करने के लिए चाहिए होती है तब कहीं जाकर आह का असर होता है।....हाँ तो हम लाज़मी characteristics की बात कर रहे थे। तो वो हैं.......
1....मौकापरस्ती---आप मौके की ताक़ में रहें, यानी ये मौका मिला, ओर ये बद्दुआ रवाना।
2....उन लफ़्ज़ों को चुन चुन कर याद करना जो कि लुगत में न हो, ओर मौका मिलते ही फ़ौरन उनका इस्तेमाल बेहद गलीज़ तरीक़े से करने का हौसला रखना।
3....चेहरे का ख़ाका बदलने का माद्दा...यूँ तो परवरदिगार ने सभी को दो आंखें, नाक , कान वगैरह वगैरह एक से दिए हैं। जिनको इंच ब इंच एक तयशुदा खांचे में रख कर एक ख़ास चेहरा तैयार होता है, जिस से हम पहचाने जाते हैं।पर बद्दुआ देने वाले में ये ख़ासियत निहायत ज़ुरूरी है कि वो बद्दुआ देते वक़्त अपने चेहरे पर चस्पा अंगों को तयशुदा इंच ब इंच एंगल से उखाड़ कर कुछ यूं बदल दे कि चेहरा तक़रीबन क्रूर और कुछ ज़्यादा असली लगने लगे। मसलन त्यौरियां 90 के एंगल तक खींचना, नाक 45 के एंगल तक फुलाना, होठों की रेडियस बुरी तरह से बिगाड़ना, आँखों का एरिया बढ़ाना वगैरह....
इस से 2 बातें होंगी
पहली ये की बद्दुआ देने में असर मालूम होगा, जैसे दवाई गर कड़वी हो तो बीमार के जल्दी ठीक होने का डर होता है, बिल्कुल वैसे ही।
दूसरी ये की ख़ुदा न करे अगर कोई ऐन बद्दुआ देते वक़्त मौके पर मौजूद न हो और ठीक बदुआ देने के बाद जलवाफ़रोश हो तो वो बद्दुआगो का चेहरा मोहरा देख कर ही समझ जाये कि ....
अव्वल तो बद्दुआ दी गयी है, और
दोयम ..किस दर्ज़े की दी गयी है।
4.चौथी और सबसे ज़ुरूरी सिफ़त है हस्सास होना... भई बग़ैर हस्सास हुए कैसे अंदाज़ा होगा कि किस असर की बद्दुआ रवाना करनी है। सो बदकर्म का अंदाज़ा लगा कर ही बद्दुआ की डोज़ तय की जाए।
यूँ नहीं कि ज़रा चलते चलते किसी से टकरा गये ओर श्राप दे मारा..की beep beep... अल्लाह करे
तुम ताउम्र एक ही जगह खड़े चलते रहो और कहीं न पहुंचो beep beep.... गोया ज़रा सी लात क्या लग गयी किसी मासूम को ताज़िन्दगी के लिए ट्रेडमिल पे खड़ा कर दिया और बद्दुआ का बटन ऑन...
न न न न...ये तो ठीक नहीं न...हड्डी टूटना, कीड़े पड़ना, या सिर्फ मुंह बिसुरा के खा जाने वाली नज़रों से देख लेना ये बेसिक ओर कॉमन बद्दुआऐं हैं जो ऐसे बदकर्म के लिए काफ़ी हैं।
सो हस्सास होना बेहद ज़ुरूरी है बद्दुआ की कैटेगरी तय करने के लिए।
तो अब मसअला ये की कोई शायर बद्दुआ कैसे देगा??
शायर चाहे कितना ही सर पटक ले तो भी ये बेहतरीन बद्दुआगो होने के लिए ज़रूरी तमाम तौफ़ीक़ हासिल कर ही नहीं सकता। और तिस पर उसे सिवा मुहब्बत के कुछ आता भी नहीं।
मसलन मौका मिलने पर शायर तुरंत उस मौके का इस्तेमाल न करते हुए उस मौके की घंटो की जुगाली करता है, और अगर उसके बाद कुछ बन भी पड़ा तो तब तक बदकर्म करने वाला बैडमैन तो कहां का कहां निकल चुका होता है। नतीजा. .... फ़ेल
अब अगर चेहरे का नक़्शा बिगाड़ने की बात करें तो शायर शायरी के चलते बह्र का इस क़दर पाबंद हो जाता है कि चेहरे के हाव भाव भी निहायत बह्र में रहते हुए इंच ब इंच वहीं रहते हैं, मजाल है कि ज़रा इधर से उधर हो जाऐं।
तो सिवा हस्सास होने के शायर तो बेहतरीन बद्दुआगो होने की कोई शर्त पूरी नहीं करता।
तो क्या शायर बद्दुआगो नहीं हो सकता??
अजी नहीं.....मियाँ शायर एक बाकमाल तरक़ीब का इस्तेमाल करता है जिस से सांप तो मरता ही है और लाठी..अजी लाठी टूटना छोड़िए दिखती भी नहीं। लोग हैरान की मियाँ मारा तो मारा किस से??
तो शायर करता ये है कि बद्दुआ के तमाम अहसास बेइन्तेहाँ चाशनी में घोल कर बशर-ए-ख़ुसूस पर शेर की सूरत में छोड़ देता है। और वो शख़्स लफ़्ज़ों की हाई डोज़ शुगर के चलते मेन्टल डाइबिटीज़ के सुपुर्द हो जाता है।
एक शायर किसी दूसरे शायर को जो बद्दुआएं दे सकता है उसके दो नमूने "मुश्ताक़ अहमद युसूफ़ी" साहब के जिगरी दोस्त "मिर्ज़ा उदूद बेग़" के हवाले से पढ़ने वालों पर खुले छोड़े जा रहे हैं...
अल्लाह करे तुम्हारा सारा कलाम दैवीय कलाम हो...(सनद रहे कि दैवीय कलाम वो कलाम है जिसमें दो मिसरों में इतने झोल और ग़लतियाँ हों कि वो इंसानी नहीं दैवीय मदद मालूम हो।)
अल्लाह करे कि तुम्हारी कब्र में कीड़े और शेर में सकते पडें......
पूजा
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