अमृता प्रीतम....मेरी नज़र में
"जिस्म की भूख के हाथों पीड़ित हो कर एक बार मैनें बाज़ार की किसी औरत के पास जाना चाहा था".....इमरोज़ ने कहा।
"जिस्म की भूख के हाथों पीड़ित हो कर एक बार मैनें बाज़ार की किसी औरत के पास जाना चाहा था".....इमरोज़ ने कहा।
सहज मेरे मुंह से निकला...,."अगर तुम ऐसी किसी औरत के पास जाते तो मेरा जी करता है कि वो औरत भी मैं ही होती"...अमृता ने कहा।
ये अमृता थीं, इस बात को और अपनी ज़िंदगी से जुड़ी तमाम बातों को मानने ओर जगज़ाहिर करने की हिम्मत रखने वालीं...अमृता
कौन थी अमृता???
लेखकों की तवील फ़ेहरिस्त में खड़ी एक लेखिका??? या एक आम औरत??
नहीं...अमृता महज़ एक लेखिका या औरत नहीं थी..वो एक सच्चाई थी जिसकी ज़िन्दगी सच्चे लम्हों और सच्चे लोगों से हैरानगी की हद तक भरी थी।
क्या थी अमृता ....जब आंखें मूंद कर ये सोचती हूं। तो तेज़ रौशनी का एक पुँज जो साफ़गोई, साफ़ दिली , ओर बेइंतहां सादगी से भरा है, सामने पाती हूँ ।ये अमृता है।
अमृता के क़िरदार और उनके कलाम पे नुक्ताचीनी करने वाले लोग शायद वे लोग है जो 'अंधेरे में सब जायज़ है' के फ़लसफ़े को मानते हैं,और सच के उजाले में जिनकी कायर आंखें मिचमिचा जाती हैं।
अमृता का नाम ज़हन में आते ही साहिर ओर इमरोज़ ये दो नाम बेसाख़्ता साथ चले आते हैं।ये तीनो क़िरदार ज़िन्दगी के तिराहे पे कुछ यूं खड़े हैं जहां से अमृता ,इमरोज़ और साहिर दोनों को देख सकती है। जहाँ इमरोज़ का मरकज़ सिर्फ़ अमृता है,वहीं अमृता की नजरें साहिर पे टिकी हैं । साहिर एक पल को अमृता से नज़रें मिलाता है और फिर अपने दिल को दुनिया की तरफ़ मोड़ देता है। अमृता ठगी सी रह जाती है और उसकी नज़र इमरोज़ की ओर उठती है और फिर वहीं ठहर जाती है।
साहिर ...अमृता का पहला प्यार....जिसके साथ उसने प्यार के म्'आनी समझे ।पर इमरोज़ के साथ उस म्'आनी को जिया।दरअस्ल अमृता ने इमरोज़ में छिपे साहिर को चाहा। ओर इस तरह वो तमाम उम्र साहिर ही को चाहती रही।
अमृता की ज़िंदगी में साहिर एक आंधी की तरह आया। वो मीठी उम्र थी। उस उम्र में इश्क़ मुहब्बत की ख़याली दुनिया को हक़ीक़त का जामा पहनाने की कितनी बैचेनी होती है, इस ख़याल से कौन नावाकिफ़ होगा? बिना किसी छल के, सारी सच्चाईयों को उधेड़े हुए ये वक़्ती आंधी एक सम मौसम बन कर अमृता के चारों और बसने लगती है। और फिर अमृता साहिर के होते हुए भी उसके न होने में उसे जीती है।
कभी साहिर के छोड़े हुए सिगरेट के टुकड़ों से उसके होठों की छुअन पाते हुए, यो कभी सर्दी में साहिर
की छाती पर बाम लगा चुकने के बाद उसके लम्स से गर्मी पाते हुए।
कोई मजबूरी... कोई बेवफ़ाई... कोई सच्चाई....या फिर क़िस्मत का लेखा..... उनका ऐका न हुआ।
दो चमकते सितारे मिल कर सूरज न बन सके...सो...अलग-अलग चमके।एक दूसरे को देखते हुए।
एक दूसरे का ताप पाते हुए......
फिर एक रोज़ काम के सिलसिले में इमरोज़ का अमृता से मिलना...एक आम सी मुलाक़ात।सादा लौह
इमरोज़ उस मिट्टी की तरह मिला, जिसने जड़ से उखड़ी हुई अमृता को आधार दिया।
जिस्म को रूह मिली। एक तेज़ चमकते सितारे में एक कम चमकीला सितारा पूरी तरह विलीन हो गया।
अमृता को ठहराव, भरोसा, निश्छल प्रेम सब कुछ देता हुआ...और बदले में कुछ न चाहता हुआ।
इमरोज़ ताउम्र अमृता का रहा...और आख़िर में अमृता ही हो गया।
कितनी अजीब बात है, अमृता ने साहिर को चाहा , फिर उसे पाना भी चाहा पर कभी पा न सकी। वहीं इमरोज़ ने अमृता को चाहा, पर उस से कभी कुछ न चाहा और उसे पा गया.....
अमृता की ज़िंदगी जाने कितने वक़्ती थपेड़ों और ऊंच नीच से भरी थी। कभी समाज का तो कभी अपने आप का सामना करते हुए वो जीवन रण में डटी रही।
जाने कैसा दरख़्त थी जो मौसम की हर मार को पछाड़ कर हमेशा हरी रही।अपने आस पास से आहत अमृता ने अपने अंदर की सच्चाई को मरने या बिखरने नहीं दिया।
शायद यही वजह थी की अमृता की ज़िंदगी सच्चे लोगों, सच्चे लम्हों, और बेहिसाब हैरानियों से भरी थी। जिसे उसने न सिर्फ जिया बल्कि क़ुबूल भी किया।
यही सब सोचते हुए मेरी नींद लग जाती है, तो ख़ाब में अमृता को पाती हूँ। उसी चिरपरिचित मुस्कान के साथ...आंखों में बच्चों की सी चमक लिए...अपने को रोक नहीं पाती और पूछ बैठती हूँ....
अमृता आपको डर नहीं लगा??? कि लोग क्या कहेंगे???
और अमृता ने बेहद संजीदगी से हौले से मुस्कुराते हुए जवाब दिया...
कौन लोग पूजा???वही जो कभी सामने आने की हिम्मत नहीं करते????
मैं उठ जाती हूँ और बरबस मेरे मुंह से निकलता है....ये है अमृता......
पूजा
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