Tuesday, 26 June 2018

Tazaa ghazal

एक नदी. के एक भंवर की
लो रक्खो चाबी लॉकर की 

शब के खाब सहर पर पूरे 
हमको एक तमन्ना घर की 

छू  कर पढ़ना सिलवट  सिलवट 
है ये ख्वाहिश इक चादर की 

ठीक है याद जुडी है पर तुम 
हालत तो देखो स्वेटर की 

जिस में ज़िक्र था इक ठोकर का 
एक कहानी थी पत्थर की 

भीतर से सब अनगढ़ पत्थर 
संगतराशी बस बाहर की  

हमें तो तामीर किया सब 
तुमने तो बस  ख़ाहिश भर की 

मैं रखती हूँ तुमको इसमें 

तुम रक्खो चाबी लॉकर की 

Pooja bhatia

3 comments:

  1. Waaaah kya baat hai kya apka what's app no mil sakta hai

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  2. सुन्दर ग़ज़ल है। 'हालत तो देखो स्वेटर की' बहुत ही उम्दा था। इमोशन और कॉमेडी दोनों साथ में लगते हैं।

    सातवें शेर में शायद टाइपो रह गया है। 'हमने' तो तामीर किया सब, होना था?

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