एक नदी. के एक भंवर की
लो रक्खो चाबी लॉकर की
शब के खाब सहर पर पूरे
हमको एक तमन्ना घर की
छू कर पढ़ना सिलवट सिलवट
है ये ख्वाहिश इक चादर की
ठीक है याद जुडी है पर तुम
हालत तो देखो स्वेटर की
जिस में ज़िक्र था इक ठोकर का
एक कहानी थी पत्थर की
भीतर से सब अनगढ़ पत्थर
संगतराशी बस बाहर की
हमें तो तामीर किया सब
तुमने तो बस ख़ाहिश भर की
मैं रखती हूँ तुमको इसमें
तुम रक्खो चाबी लॉकर की
Pooja bhatia
Waaaah kya baat hai kya apka what's app no mil sakta hai
ReplyDeleteVah
ReplyDeleteसुन्दर ग़ज़ल है। 'हालत तो देखो स्वेटर की' बहुत ही उम्दा था। इमोशन और कॉमेडी दोनों साथ में लगते हैं।
ReplyDeleteसातवें शेर में शायद टाइपो रह गया है। 'हमने' तो तामीर किया सब, होना था?