वाक़या हाल ही का है, एक मुशायरे में जाना हुआ। कमोबेश हर शायर ने अपने कुछ कलाम तहत में पढ़े और फिर अचानक बिना कोई चेतावनी दिए गले के की-बोर्ड को खंखार कर झटका,पटका, कुछ ठिकाने लगाया और तरन्नुम के दरिया में छलांग लगा दी। उनमें से कुछ तो हमें अपने साथ डुबो देने को आमादा थे, कुछ हद तक उनकी कोशिशें कामयाब होती दिख भी रही थी कि अल्लाह के रहमो करम् से ख़ुद उनके गले ने आगे बढ़ने से जवाब दे दिया और हम शहीद होते होते बाच गए ,पर फिर भी अपने कानों को ज़ख़्मी होने से बचा न पाए। ख़ैर... तहत या तरन्नुम शायर की अपनी पसंद का मुआमला है जिस पर मुझे कोई ऐतराज़ नहीं। पर ये तो सीधा सीधा बदला लेना है कि आप अपनी एक ही ग़ज़ल को तरन्नुम के अखाड़े में 20 मिनट तक पेलते रहें और वो भी इस उम्मीद से की बतर्ज़े 2 एकम 2, 2 दूनी 4 लोगों को अपनी ग़ज़ल रटवा के ही मानेंगे।
मुझे तो ये ख़ालिस अत्याचार लगा...इतना कि कानों को बचाने के चक्कर में फ़सील की मानिंद जो रुई ठूंसी थी वो पहले मिसरे के repeat होते ही कान का साथ छोड़ कर वातानुकूलित हवाओं का हाथ थाम अपनी जान को बचा गयी और हमारे कान और ज़हन दोनों ज़ख़्मी हो गए।
पर जैसा कि हम जानते हैं हर चीज़ का अंत तय है...उस अत्याचार का भी हुआ। जब मेरी बारी आई तो बमुश्किल अपना बेलेंस बनाते हुए मैंने अपना कलाम पढ़ना शुरुअ किया, अभी दो-एक शेर पढ़े ही थे कि कहीं से आवाज़ आयी "मोहतरमा आप से तो तरन्नुम में ही सुनेंगे "...
ख़ुदा कसम एक बारगी दिल किया कि बदला लेने का ऐसा मौका फिर जाने कब मिले. सारे सुरों की खिचड़ी बना के पेल दी जाए। पर तुरंत ही ज़हन ने दिल पर लात मारी ओर बद्दुआएं जमअ न करने की ताक़ीद की। सो मैं तहत का दामन पकड़े रही।
इतने में फिर एक आवाज़ नाचती कूदती मुझ तक आयी कि कुछ गाकर सुनाइये....मैने कहा मैं ज़ुरूर गाती पर मैं कानून की बेहद इज़्ज़त करती हूँ, मेरे और तरन्नुम के दरमियाँ इ एक करार नामा है जो मुझे रोकता है...मुझे मुआफ़ कीजियेगा।...
पूछने पर की कैसा ओर कौन सा करार...? मुझे बताना पड़ा।
दोस्तो कुछ अरसे पहले की बात है लता ताई...( अरे हमारी अपनी लता मंगेशकर ) और मेरे बीच एक कानूनी करार हुआ है जिसके तहत हम दोनों ने एक-एक अहद उठायी है और वो ये कि वो कभी भी ग़ज़ल नहीं कहेंगी ...और मैं गाऊँगी नहीं.
इस तरह हम दोनों एक दूसरे के पेट पे लात न मारेंगे।
और इस करारनामे की बदौलत में ही जानती हूँ कि मैंने कितनी दुआएं इकठ्ठा की।
मुशायरे के बअद कुछ लोगों ने चुपके से मेरे ज़ख़्मी कान में कहा..
काश की ऐसा करारनामा बाक़ी के शायर भी बनवा लें......
मैं मुस्कुरा दी.....और मैं कर भी क्या सकती थी।
पूजा
मुझे तो ये ख़ालिस अत्याचार लगा...इतना कि कानों को बचाने के चक्कर में फ़सील की मानिंद जो रुई ठूंसी थी वो पहले मिसरे के repeat होते ही कान का साथ छोड़ कर वातानुकूलित हवाओं का हाथ थाम अपनी जान को बचा गयी और हमारे कान और ज़हन दोनों ज़ख़्मी हो गए।
पर जैसा कि हम जानते हैं हर चीज़ का अंत तय है...उस अत्याचार का भी हुआ। जब मेरी बारी आई तो बमुश्किल अपना बेलेंस बनाते हुए मैंने अपना कलाम पढ़ना शुरुअ किया, अभी दो-एक शेर पढ़े ही थे कि कहीं से आवाज़ आयी "मोहतरमा आप से तो तरन्नुम में ही सुनेंगे "...
ख़ुदा कसम एक बारगी दिल किया कि बदला लेने का ऐसा मौका फिर जाने कब मिले. सारे सुरों की खिचड़ी बना के पेल दी जाए। पर तुरंत ही ज़हन ने दिल पर लात मारी ओर बद्दुआएं जमअ न करने की ताक़ीद की। सो मैं तहत का दामन पकड़े रही।
इतने में फिर एक आवाज़ नाचती कूदती मुझ तक आयी कि कुछ गाकर सुनाइये....मैने कहा मैं ज़ुरूर गाती पर मैं कानून की बेहद इज़्ज़त करती हूँ, मेरे और तरन्नुम के दरमियाँ इ एक करार नामा है जो मुझे रोकता है...मुझे मुआफ़ कीजियेगा।...
पूछने पर की कैसा ओर कौन सा करार...? मुझे बताना पड़ा।
दोस्तो कुछ अरसे पहले की बात है लता ताई...( अरे हमारी अपनी लता मंगेशकर ) और मेरे बीच एक कानूनी करार हुआ है जिसके तहत हम दोनों ने एक-एक अहद उठायी है और वो ये कि वो कभी भी ग़ज़ल नहीं कहेंगी ...और मैं गाऊँगी नहीं.
इस तरह हम दोनों एक दूसरे के पेट पे लात न मारेंगे।
और इस करारनामे की बदौलत में ही जानती हूँ कि मैंने कितनी दुआएं इकठ्ठा की।
मुशायरे के बअद कुछ लोगों ने चुपके से मेरे ज़ख़्मी कान में कहा..
काश की ऐसा करारनामा बाक़ी के शायर भी बनवा लें......
मैं मुस्कुरा दी.....और मैं कर भी क्या सकती थी।
पूजा
वैसे लता जी की मधुर आवाज में (कम से कम) एक ग़ज़ल तो मैंने सुनी है। "सादगी" (एल्बम) से फ़रहत शहज़ाद साहब की लिखी "मुझे ख़बर थी, वो मेरा नहीं पराया था"। :-)
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